फिल्म समीक्षा - 'कबीर सिंह'

कबीर सिंह एक ऐसे प्रेम दिवाने की कथा है जो पूरी तरह प्रेम में दिवाना हो जाता है। और इस फिल्म का नाम भी इसके मुख्य किरदार के नाम पर ही रख दिया गया है जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि फिल्म एक प्रेम दिवाने की है। संदीप रेड्डी बंगा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कबीर सिंह’ पर्दे पर रिलीज हो चुकी है।

फिल्म समीक्षा - 'कबीर सिंह'
'कबीर सिंह' पोस्टर

‘एक हसीना थी, एक दिवाना था’ ऋषि कपूर के ‘कर्ज़’ फिल्म का यह गाना तो शायद ही आपकों याद हो, ख़ासकर आज के युवा वर्ग को, लेकिन अपने घरों में बड़े-बुजुर्गों को तो इस गाने को गुनगुनाते हुए आपने जरूर सुना होगा। सुभास घई द्वारा निर्देशित 1980 में बनी इस फिल्म का यह गाना तमिल फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की हिन्दी रीमेक फिल्म ‘कबीर सिंह’ पर अधिक जचती है। कबीर सिंह एक ऐसे प्रेम दिवाने की कथा है जो पूरी तरह प्रेम में दिवाना हो जाता है। और इस फिल्म का नाम भी इसके मुख्य किरदार के नाम पर ही रख दिया गया है जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि फिल्म एक प्रेम दिवाने की कहानी पर आधारित है। संदीप रेड्डी बंगा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कबीर सिंह’ पर्दे पर रिलीज हो चुकी है। जिसमें शाहिद कपूर वकियारा आडवाणी मुख्य भूमिका में है। इसमें शाहिद कपूर कबीर सिंह के किरदार में है जो प्रेम में इतना अधिक दिवाना हो जाता है कि खुद को बर्बाद करने लगता है ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या उसे अपनी प्रेमिका मिल पाती है?

‘कबीर सिंह’ में कबीर (शाहिद कपूर) एक मेडिकल छात्र है। जो मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है और पढ़ाई में भी तेज है। परन्तु उसका व्यवहार गुस्सेल किस्म का है। उसके कॉलेज में एक नई छात्रा प्रीति (कियारा आडवाणी) आती है प्रीति भोली-भाली और शांत स्वभाव की लड़की है। कबीर प्रीति को देखकर सभी क्लासरूम में कह देता है कि कोई भी लड़का उसे आँख उठाकर नहीं देखेगा क्योंकि वो सिर्फ़ मेरी है। शुरू-शूरू में प्रीति कबीर से सहमी-सहमी सी रहती है पर बाद में वह भी कबीर को पसंद करने लगती है और कबीर के साथ बाहर आने - जाने लगती है।

यह सब होने के बाद समस्या यह खड़ी उठती है कि क्या आखिर प्रीति के परिवार वाले कबीर और प्रीति की शादी के खिलाफ होते है।

कबीर प्रीति के प्यार में इतना दिवाना हो जाता है कि वह शराब व अन्य नशीले पदार्थों का आदी हो जाता है। और शराब के नशे में ही वो सर्जरी करने लगता जिस कारण उसका मेडिकल लाइसेंस 5 सालों के लिए रद्द कर दिया जाता है। बाद में प्रीति की शादी भी हो जाती है अब देखना यह होगा कि क्या कबीर प्रेम में पागल हो जाएगा है या यूँ ही देवदास की तरह रहता है इसके लिए आपको फिल्म देखना होगा।

‘कबीर सिंह’ फिल्म में ऐसी मान्यताओं व स्थितियों को दिखाया गया है जिसमें अगर कोई पुरूष जो भी करें वो सही है चाहे वो प्रेमी ही क्यों न हो, और दुसरा, कॉलेज परिसर में रैगिंग की घटना दिखाना जबकि अब किसी भी कॉलेज में रैगिंग नहीं होती और इसके लिए सरकार कानून भी बना चुकी है। साथ ही भारतीय सिनेमा की बरसों से चली आ रही वह स्थिति भी दर्शायी गई है जिसमें सालों से नायक को हमेशा आदर्शवादी की भूमिका में ही दर्शाया गया है  लेकिन क्या भारतीय सिनेमा नायक की कमजोरियों व उसमें मौजूद बुराईयों के साथ नहीं अपना सकता? क्या नायक को हमेशा सामाजिक कर्तव्यों व नैतिकता के मापदंडो पर खड़ा उतरना जरूरी है ? तो वहीं प्रीति के किरदार को इस तरह पेश किया गया है जिसमें वह अपने आशिक़ द्वारा किए गए गतिविधियों का विरोध नहीं करती है। बल्कि वह भी उसे पसंद करने लगती है। खैर वर्तमान स्थिति से यह बिल्कुल विपरित है । 

हालाँकि यह एक तेलुगु फिल्म की रीमेक है तो ज़ाहिर है विसंगतिया तो होगी ही। जहाँ तेलुगु फिल्म में जातिवाद का मसला होता है तो वहीं रीमेक कबीर सिंह में विवाद का मुख्य कारण यह होता कि लड़की के पिता को लड़का आवारा और लफंगा लगता है इसीलिए वह शादी के लिए राजी नहीं होते है। खैर फिल्म युवा वर्ग को अधिक लुभावनी लग सकती है। क्योंकि यह आज के युवा वर्ग को की वास्तविक स्थिति को दर्शाती है।
 


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