सिनेमा

आखिरकार सिनेमा है क्या? कोई मनोरजन का साधन है सिनेमा या दो युगल जोड़े की मधुर कहानी है सिनेमा, बचपन की याद जो दिलाए क्या वो है सिनेमा या जो जिंदगी के व्यक्तित्व को दर्शाए  वो है सिनेमा या फिर नायक और नायिका की सदुंर प्रेम कथा है सिनेमा ?

सिनेमा
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'सिनेमा' आखिरकार सिनेमा है क्या? कोई मनोरजन का साधन है सिनेमा या दो युगल जोड़े की मधुर कहानी है सिनेमा, बचपन की याद जो दिलाए क्या वो है सिनेमा या जो जिंदगी के व्यक्तित्व को दर्शाए  वो है सिनेमा या फिर नायक और नायिका की सदुंर प्रेम कथा है सिनेमा ? सिनेमा वो नहीं जो सिर्फ मनोरंजित और आनंदित करें, पर्दे पर दिखाई जानी वाली 2 घंटे की फ़िल्म भी सिनेमा ही है भले ही वो मनोरंजन हो , प्रेेंम कथा हो या अन्य किसी विषय पर भी हो, लेकिन वो इन्ही माध्यम क द्वारा समाज या जिन विषय पर फ़िल्म बनी हो उनसे जुड़ी सभी वस्तु या किसी समुदाय को एक गंभीर और सत्य संदेश उपलब्ध कराती हो वही सिनेमा है। 

सिनेमा वो है  आपको, आकर्षित तो करे ही साथ ही उसके माध्यम से आप उस संदेश को भी जान सके जो उस चलचित्र के द्वारा आप तक पहुंचाया जा रहा है परन्तु हमारे भारतीय समाज सिर्फ इसे मनोरंजन तक ही सीमित माना जाता है लेकिन इसके अगर वास्तविकता को जाननेे का प्रयास करें तो इस क्षेत्र में भी महिलाओं का स्थान कम ही रहा है भले ही नायिका के किरदार में वहअच्छी ख़ासी भूमिका में रही परन्तु एक फिल्म निर्माता के स्थान पर महिलाओें का स्थान अछूता ही रहा है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि महिलाएं इस क्षेत्र में कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाएंगी ।

इसके परे दस्तावेजी सिनेमा के क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई जिनमे से कुछ महिलाए रीना मोहन, मीरा दिवान, परिणीति वोरा, पोजिया फातिमा जैसी महिलाएं शामिल है । इन सभी महिलाओं ने समाज से परे जाकर अपनी कला को दुनिया के सामने रखा। लेकिन आज भी भारतीय समाज की रूढ़िवादिता महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगाती है। जिससेे उन्हे अपनी कला को प्रदर्शित करनेे में सक्षम नहीं हो पाती हैै। इन सभी के इतर प्रतिस्पर्धा ही सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह युग प्रतिस्पर्धा को युग है और हर क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है परन्तु चुनौतियां ही सफ़ल करतर की एक मात्र सीढ़ी होती है।


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